Oct 29, 2010

ग़ज़ल : तूफ़ां ने खुशियों का मन्ज़र छीन लिया

तूफ़ां ने खुशियों का मंज़र छीन लिया
 उसने मुझसे मेरा ही घर छीन लिया ।

यह ताकत की बात नहीं थी. हिम्मत थी,
दुर्बल ने क़ातिल से खंजर छीन लिया ।

साथ दिया जिसने रोगी का सालों तक,
मौत ने  उसका वो ही बिस्तर छीन लिया ।

घेराबन्दी की बादल सेना ने और्,
सूरज से किरणों का गट्ठर छीन लिया ।

मुझको सत्ता में पहुंचाकर लोगों ने,
खुद से ही मिलने का अवसर छीन लिया ।

तिकडमबाज़ी ने सम्मान दिलाया पर
मुझसे मेरे फ़न का मन्तर छीन लिया ।


भूख, गरीबी, लाचारी के पंजों ने,
कुछ बच्चों का बचपन अक्सर छीन लिया ।

3 comments:

POOJA... said...

bahut sundar gazal...

robotics said...

achchha hai dear

सतीश सक्सेना said...

यह ताकत की बात नहीं थी. हिम्मत थी,
दुर्बल ने क़ातिल से खंजर छीन लिया ।


आप प्रभावित करने में कामयाब हैं भाई जी !
बधाई !